चलते रहो
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| चलते रहो |
चलते
रहो
रोकना
ना कभी
मंजिल
कितनाभी दूर हो
थकना
मत कभी
आगे
बढ़तेही जाइए
चलते
रहिए चलते रहिए II
शिखभी
लोना एक नदी से
कैसे
हमेसा व दौडताही रहता
मंजिल
अबस उसे है पता
मगर
थकता काहाँ रुकता काहाँ
मंजिलको
पास आनेको बेबस करता II
सिख
भी लो तुम सूरज से
किसे
पता सहिसे क्या व पाता
मगर
अनुदिन अपना काम करता
होता
लाभया नुकसान नहीं सोचता
ऐसे
ही अपना कर्तब्यनिष्ठा दिखाता
बजह
सरबे भबन्तु सुखिनो की बार्ता II
ततबत
तुम भी कभी ठेहेरो मत
चलतेही
रहना आपनी मंजिल पानेतक
ये
बुरी दिन एकदिन चलजाएगी है पता
मंजिल
मिलेगाही चलजाएगी सरे ब्यथा II

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